प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास में जब भी किसी शक्तिशाली साम्राज्य की चर्चा होती है, तो रोमन साम्राज्य और मौर्य साम्राज्य का नाम गर्व से लिया जाता है। रोमन साम्राज्य अपने समय में 52 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ था और इसकी जनसंख्या लगभग 7 करोड़ थी। इस विशाल साम्राज्य को संचालित करने के लिए जनता से टैक्स वसूला जाता था, और उस टैक्स का उपयोग साम्राज्य को उन्नत बनाने में किया गया। भव्य नगरों, विशाल स्टेडियमों, शानदार इमारतों का निर्माण किया गया। रोमन सेना, जिसमें 5 लाख सैनिक शामिल थे, उसी टैक्स के पैसे से पोषित होती थी। इस शक्तिशाली सेना ने साम्राज्य की सीमाओं को सुरक्षित रखा और व्यवस्था बनाए रखी। इसके अलावा रोमन साम्राज्य में पक्की और सुव्यवस्थित सड़कें बनाई गईं, जिनमें से कई ऐसी थीं जो 1500 साल बाद भी उपयोग में लाई जा रही थीं — यह उनकी दूरदर्शिता और गुणवत्ता का प्रमाण है।
इससे करीब 500 साल पहले भारत में मौर्य साम्राज्य की स्थापना हुई, जिसकी सीमाएं वर्तमान भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, अफगानिस्तान और ईरान तक फैली थीं। जनसंख्या करीब 3 करोड़ के आसपास थी। मौर्य शासकों, विशेषकर सम्राट अशोक, ने टैक्स से प्राप्त राजस्व का उपयोग जनता के कल्याण के लिए किया। उन्होंने अस्पतालों, विश्वविद्यालयों, धर्मशालाओं, आश्रय स्थलों और भव्य इमारतों का निर्माण कराया। उनका प्रशासनिक ढांचा और सामाजिक सोच अपने समय से बहुत आगे था। मौर्य साम्राज्य की सेना दुनिया की सबसे बड़ी और संगठित सेनाओं में से एक थी — लगभग 6 लाख सैनिकों की फौज, जो न केवल संख्या में बड़ी थी, बल्कि स्टील जैसी मजबूत कवचों और अनुशासन से भी सुसज्जित थी।
सिर्फ सैन्य शक्ति ही नहीं, मौर्य शासन ने अधोसंरचना के क्षेत्र में भी ऐतिहासिक काम किया। उन्होंने चित्तगोंग से काबुल तक उत्तरापथ नामक एक लंबी और मजबूत सड़क का निर्माण किया। यह सड़क आज के जीटी रोड का ही रूप है, जो 2300 वर्षों बाद भी भारत के कई हिस्सों को जोड़ती है और विकास की रीढ़ मानी जाती है।
अब सवाल उठता है कि इन महान साम्राज्यों के बाद, जब भारत में विशेष जातियों के शासकों ने राज किया, तो उन्होंने उस टैक्स का क्या किया जो जनता की मेहनत से इकट्ठा किया गया था? क्या उन्होंने अस्पताल बनाए? क्या उन्होंने शिक्षा के लिए विद्यालय या विश्वविद्यालय खड़े किए? क्या उन्होंने ऐसी सड़कें बनाईं जो आने वाली पीढ़ियों के लिए उदाहरण बन सकें? अफ़सोस की बात है कि इनमें से अधिकांश शासकों ने टैक्स का उपयोग जनता के विकास की बजाय विलासिता, युद्ध, और दरबारी ठाठ-बाट पर किया। उनके महलों में सोने-चांदी के सिंहासन तो थे, लेकिन जनता के पास पीने को स्वच्छ पानी तक नहीं था।

जब अंग्रेज भारत आए, तो उन्हें एक लुटेरा कहा गया — और यह सच भी है कि उन्होंने भारत से अकूत धन संपदा लूटी। लेकिन साथ ही यह भी सत्य है कि उन्होंने कुछ ऐसी बुनियादी संरचनाएं भी दीं जो आज भी काम आ रही हैं। उन्होंने रेल नेटवर्क तैयार किया, आधुनिक सड़कें बनाई, स्कूल, कॉलेज और नगरों की स्थापना की, न्यायिक प्रणाली दी जो आज भी भारतीय संविधान की बुनियाद में है। यह अलग बात है कि उनके इन कार्यों के पीछे भी उनका स्वार्थ छिपा था, लेकिन कम से कम उनके कार्यों ने देश को एक आधुनिक प्रशासनिक ढांचा और अधोसंरचना दी।
अब जब हम इतिहास की समीक्षा करते हैं, तो यह आवश्यक हो जाता है कि हम यह समझें कि टैक्स का सही उपयोग क्या है। एक शासक की असली जिम्मेदारी केवल राज्य चलाना नहीं, बल्कि राज्य को ऐसा बनाना है जिसमें जनता को सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान मिल सके। टैक्स जनता की मेहनत की कमाई होती है और इसका उपयोग भी उसी जनता की भलाई के लिए होना चाहिए — न कि केवल महलों, जश्न और खुद के यशगान के लिए।
